Wednesday, September 25, 2013

गणपतिमंडलों के खिलाफ भी एफआईआर

अवैध बैनर पोस्टर के खिलाफ जारी अभियान में बीएमसी ने कई गणपतिमंडलों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की है। पिछले कई दिनों से शहर में जहां-तहां फैले अवैध बैनर और पोस्टर्स को हटाने के लिए बीएमसी लगातार कार्रवाई कर रही है। 
गणपति बप्पा के पंडाल बनानेवाले सार्वजनिक मंडलों ने भी जमकर प्रचार और स्वागत के बैनर व पोस्टर लगाए हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो अब तक 20 से ज्यादा गणपति मंडलों पर एफआईआर दर्ज की गई है।
 
इनके खिलाफ एमएमसी एक्ट 328/328A 471 के तहत मजिस्ट्रेट कोर्ट में मुकदमा चलाया जाएगा। यहां यदि ये दोषी पाए जाते हैं तो इन पर 500 से 50000 रुपये तक जुर्माना लगाया जाएगा। बीएमसी के लाइसेंस सुपरिटेंडेंड शरद बांदे ने कहा कि जैसे-जैसे हमें बैनर और पोस्टर्स लगानेवाले का पता चलेगा आरोपियों एफआईआर दर्ज कोर्ट में मुकदमा दायर किया जाएगा।
 

Tuesday, September 24, 2013

25 साल की एक लड़की का शव मिला

 मुंबई में बांद्रा वर्ली सी लिंक के पास 25 साल की एक लड़की का शव मिला है। शव को धारदार हथियार से कई टुकड़ों में काटा गया है। शव के कई हिस्से गायब हैं। पुलिस को शक है कि यह किसी मॉडल का शव हो सकता है।
पुलिस ने बताया कि बोरे में लाश को बांधकर समुंद्र में बाहने की कोशिश की गई थी। अब तक लड़की की पहचान उजागर नहीं हो पाई है।

Thursday, September 19, 2013

नई कार्यकारणी में पहली बार एक-तिहाई पद हिंदीभाषियों को बहाल

मुंबई बीजेपी की नई कार्यकारणी में पहली बार एक-तिहाई पद हिंदीभाषियों को बहाल किए गए हैं। नए अध्यक्ष आशीष शेलार की इस 'छप्पर फाड़ सौगात' के पीछे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के वरदहस्त की अहम भूमिका मानी जा रही है। 
राजनीतिक तौर पर इसे हिंदीभाषी वोट बैंक में हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश से भी जोड़कर देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि पिछले दिनों मुंबई यात्रा के दौरान राजनाथ सिंह ने शेलार की हिंदी भाषी रणनीति को स्वीकृति दी है। शेलार के राजनाथ से बेहद करीबी संबंध बताए जाते हैं।
 
मुंबई बीजेपी अध्यक्ष पद पर मराठी भाषी शेलार की नियुक्ति के बाद पार्टी में एक प्रबल वर्ग हिंदी भाषियों को हाशिए पर भेजे जाने की भविष्यवाणी करने में जुटा हुआ था। कुल 28 पदाधिकारियों में नौ हिंदी भाषियों की नियुक्ति करके शेलार ने उनकी बोलती बंद कर दी है।
 
मुंबई बीजेपी के 10 उपाध्यक्षों में चार- दीनानाथ तिवारी, संजय उपाध्याय, करुणाशंकर ओझा और अमरजीत सिंह- हिंदी भाषी हैं। चारों अनुभवी हैं और इससे पहले भी पार्टी के प्रमुख पदों पर रह चुके हैं। सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन अमरजीत मिश्रा की महासचिव पद पर नियुक्ति है। मुंबई में सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों में बेहद सक्रिय मिश्रा को उत्तरभारतीय मोर्चा के सीमित दायरे से ऊपर उठकर काम दिखाने का अवसर दिया गया है।
 
इसी तरह पुराने दिग्गज विवेकानंद गुप्ता और विनोद मिश्रा के साथ युवा चेहरे संतोष सिंह को भी मंत्री पद की जिम्मदारी दी गई है। इसके अलावा, जानेमाने उद्यमी व समाजसेवी सुरेशभाई अग्रवाल को सह-कोषाध्यक्ष का जिम्मा सौंपा गया है।
 
इतना ही नहीं, मुंबई युवा मोर्चा के अध्यक्ष पर भी गणेश पांडे को मौका दिया गया है। योगेश वर्मा को प्रवक्ता नियुक्त किया गया है। नगरसेवक ज्ञानमूर्ति शर्मा उत्तर भारतीय मोर्चा की कमान संभालेंगे। इसी क्रम से जुड़े घटनाक्रम में ओमप्रकाश चौहान को महाराष्ट्र बीजेपी मीडिया सेल का सदस्य नियुक्त किया गया है।


Saturday, September 14, 2013

हिन्दी ! भारत- माता के माथे की बिंदी

हिन्दी ! भारत- माता के माथे की बिंदी ! सभी हिन्दी भाषियों को हिदी दिवस की शुभकामनायें ,एवं अहिन्दी भाषियों को हिन्दी भाषा अपनाने का आवाहन ! जय हिन्दी !

Tuesday, September 10, 2013

गणपति का पूजन एक ही जगह पर

ग्रांट रोड के गांव देवी स्थित एक चाल में 1934 से पुथु लक्ष्मण मानकट्टी का परिवार पारंपरिक तरीके से मंुबई का सबसे पहला गणपति बिठाते हैं। गणेश चतुर्थी के दिन परिवार के सभी लोग पारंपरिक तरीके से बैंड-बाजे के साथ सिर पर पीढ़ी लेकर गणपति को मूर्तिकार के पास से सुबह-सुबह लाते हैं और फिर उसके बाद निर्धारित जगह पर प्रतिमा को स्थापित उनका पूजन करते हैं। गणपति का पूजन सुबह से प्रारंभ होकर देर शाम तक चलता है। हालांकि, दोपहर बाद से गणपति को विसर्जित करने की तैयारियां शुरू हो जाती है। इस दौरान तीन बार बप्पा की आरती होती है, जिसके बाद देर रात परिवार के लोग सिर पर गणपति को बिठाकर नाचते-गाते हुए गिरगांव चौपाटी की ओर विसर्जित करने के लिए निकल पड़ते हैं। गिरगांव चौपाटी पर करीब डेढ़ बजे रात में परिवार के लोग गजानन की प्रतिमा को समंदर में प्रवाहित कर सुबह होने से पहले ही घर लौट जाते हैं। यह परंपरा मानकट्टी परिवार पिछले 78 साल से करते आ रहे हैं। इस बार परिवार की चौथी पीढ़ी विघ्नहर्त्ता का पूजन करने वाले हैं। एक ही स्थान पर एक ही दिशा में पूजन मानकट्टी परिवार के सदस्य पुथु लक्ष्मण मानकट्टी ने बताया कि तमाम परेशानियों के बावजूद लंबोदर की पूजा एक ही दिशा में एक ही घर में एक ही स्थान पर करते हैं। हालांकि, 78 सालों में बिल्डरों या रिडिवेलपमेंट की वजह से कई बार स्थान बदलने की बात की गई, पर गणपति का पूजन एक ही जगह पर किया जाता है। इस दौरान मानकुट्टी परिवार के पांच भाईयों के परिवार सहित कम से कम 50 लो पूजा में भाग लने के लिए देश-विदेश से हर साल आते हैं। 

Monday, September 2, 2013

मेगा ब्लॉक- ऐसे में आसाराम के समर्थकों के इस हंगामे की वज

 संडे को सेंट्रल लाइन पर कल्याण औरअंबरनाथ के बीच मेगा ब्लॉक था। पहले से ही लोग परेशानथे। ऐसे में आसाराम के समर्थकों के इस हंगामे की वजह सेलोग खासे परेशान हुए। मेगा ब्लॉक में इस एक्सट्रा मुसिबत सेपरेशान लोगों की आम प्रतिक्रिया आसाराम के प्रति काफीतीखी थी। 
उल्हासनगर
 रेलवे स्टेशन पर रविवार को आसाराम केसमर्थकों ने एक घंटे से भी अधिक समय तक लोकल ट्रेनरोककर प्रदर्शन किया। आशाराम के समर्थक रेलवे पुलिस परभारी पड़े। रेलवे पुलिस तमाशबीनों की तरह एक तरफ खड़ीरही। समर्थकों ने सेंट्रल पुलिस स्टेशन पर भी हंगामा मचाया। 
आसाराम
 के समर्थकों ने उल्हासनगर रेलवे स्टेशन पर करीब 1 घंटा 3 मिनट तक लोकल ट्रेनों को रोके रखा।मिली जानकारी के अनुसार रविवार दोपहर को आशाराम बापू के समर्थक हजारों की संख्या में उल्हासनगर रेलवेस्टेशन पहुंच गए। यहां प्लेटफॉर्म और रेलवे ट्रैक पर खड़े होकर उन्होंने एक घंटे से भी अधिक देर तक ट्रेनों कोरोके रखा। 
इस
 दौरान रेलवे पुलिस असहाय दिखी और तमाशबीनों की तरह तमाशा देखती रही। बाद में कुछ अन्य समर्थकोंऔर स्थानीय नेताओं के समझाने के बाद समर्थक रेलवे ट्रैक से हटे और हजारों की संख्या में सेंट्रल पुलिस स्टेशनपहुंच गए , जहां उन्होंने आशाराम के निर्दोष होने की बात कही और उन्हें जेल भेजे जाने पर सामूहिक गिरफ्तारीदेने की बात रखी। 
आसाराम
 के समर्थकों में महिलाओं की बड़ी संख्या होने के कारण सेंट्रल पुलिस स्टेशन के पुलिसकर्मियों को स्थितिसंभालने में काफी मशक्कत करना पड़ी। शिवसेना के लोग भी आशाराम के समर्थन में दिखे। शिवसेना केनगरसेवक राजेंद्र भुल्लर महाराज यहां खासतौर पर मौजूद रहे। वहीं दूसरी ओर आशाराम बापू के प्रवचनों औरअन्य आयोजनों के दौरान उल्हासनगर में बड़े - बड़े बैनर और पोस्टर लगाने वाली उनकी नेता मंडली विरोधप्रदर्शन से गायब दिखी। सायन रेलवे स्टेशन पर भी रविवार दोपहर करीब 3 बजे आशाराम बापू के समर्थकों नेट्रेन रोकने की कोशिश की
सायन
 , चेंबूर और किंग्स सर्किल में भी आशाराम की गिरफ्तारी के विरुद्घ प्रदर्शन हुए। दोपहर करीब 3 बजेसायन रेलवे स्टेशन पर समर्थकों ने ट्रेन रोकने का प्रयास किया। परिवहन बाधित होते देख यहां रेलवे पुलिस कोहल्का बल प्रयोग करना पड़ा। पुलिस के तेवर देख आशाराम के समर्थक तितर - बितर हो गए। कुछ समर्थकों कोगिरफ्तार भी किया गया है। 

Friday, August 30, 2013

महिलाओं को बिना वजह हर प्रॉडक्ट का रैपर बनाना न तो सैद्धांतिक रुप से सही है और न सामाजिक तौर पर.

महिलाओं के साथ घटने वाले हर अपराध के बाद फिल्मों, टीवी और विज्ञापनों में परोसा जाने वाली सामग्री निशाने पर होती है। समाज का बड़ा तबका तबका मानता है कि इससे लोगों की खासकर युवाओं की मानसिकता पर फर्क पड़ता है। हालांकि हर बार यह विषय एक लंबी और अंतहीन बहस का मुद्दा बनकर रह जाता है। शक्ति मिल गैंगरेप कांड के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चौपाल पर है। बाजार के अपने तर्क हैं, पर दम इस बात में भी है कि महिलाओं को बिना वजह हर प्रॉडक्ट का रैपर बनाना न तो सैद्धांतिक रुप से सही है और न सामाजिक तौर पर...। 
एक वक्त था, जब दूरदर्शन पर एक कंडोम के ऐड का विज्ञापन आता था। जब चैनल बदलने के भी ऑप्शन कम थे। हालांकि उसमें अश्लीलता नहीं थी, पर आज के विज्ञापनों में पुरुष-महिलाओं के अंतरंग संबंधों को खुलेआम दिखाया जाता है। न के बराबर कपड़ों में महिलाएं सिर्फ कंडोम के ऐड पर ही नहीं, डियो और बाइक के ऐड पर भी दिखाई देती हैं। हर रेप की घटना के बाद ऐसी बहस होती है कि फिल्में और ऐड भी इन घटनाओं के लिए अप्रत्यक्ष भूमिका निभाते हैं। महालक्ष्मी के शक्ति मिल कंपाउंड में हुए गैंगरेप ने इस कुकर्म के पीछे के कारणों पर सोचने को मजबूर कर दिया है। आखिर इतने हंगामे के बावजूद क्यों रेप जैसे घिनौने कृत्य पर रोक नहीं लग पा रही है। इस सवाल ने कानून और लोगों की सोच को शंका के कठघरे में खड़ा कर दिया है। 16 दिसंबर के दिल्ली गैंगरेप के बाद समाज के एक तबके में बहस उठी कि वर्तमान में बन रहीं फिल्मों और विज्ञापन में महिलाओं को 'ऑब्जेक्ट' के तौर पर पेश किया जाना रेप के लिए कुछ हद तक जिम्मेदार है। हालांकि, यह बहस किसी नतीजे पर पहुंचे बिना ही दब गई। आज टेलिविजन पर दिखाया जाने वाला हर दूसरा विज्ञापन 'अश्लीलता' और 'नग्नता' की गवाही देता है। इन चीजों का बार-बार दिखाया जाना कहीं न कहीं सेक्स के प्रति उकसाने वाला साबित हो रहा है। इन चीजों का पुरुषों की मानसिकता पर काफी प्रभाव पड़ता है।
 
सीमेंट, कार, शेविंग क्रीम, फ्रिज, हर ऐड में महिलाएं
 गौर करने वाली बात यह है कि पिछले कुछ सालों से हर विज्ञापन में जरूरत नहीं पड़ने पर भी महिला के अंग प्रदर्शन का सहारा लिया जा रहा है। पहले एक्का-दुक्का विज्ञापनों में यह दिखाई देता था, लेकिन अब ऐसा लगता है कि जब तक औरत का बदन नहीं दिखाया जाएगा, कोई सामान बिकेगा ही नहीं। सीमेंट, कार, शेविंग क्रीम, बाइक, डियो, यहां तक कि मर्दों के अंडरगार्मेंट्स तक के ऐड में महिलाएं होती हैं, जिनका इन ऐड्स का कोई लेना-देना नहीं है। कुछ समय पहले तक एक सीमेंट कंपनी ने अपना विज्ञापन बिकिनी पहने पानी से बाहर आती एक लड़की को दिखाता हुआ बनाया। 'विश्वास है इसमें कुछ खास है' इस टैग लाइन के अलावा विज्ञापन में सिर्फ देह प्रदर्शन किया गया है। सीमेंट के विज्ञापन में बिकिनी पहने महिला को दिखाने का तर्क समक्ष नहीं आता। इसी तरह कार और बाइक के तकरीबन सभी विज्ञापन लड़कियों को पटाने से जोड़कर दिखाया जाता है। फलां बाइक या कार खरीदिए लड़की आपसे इंप्रेस होगी। इसी तरह शेविंग क्रीम, फ्रिज से लेकर चॉकलेट्स तक के विज्ञापन सेक्स और अश्लीलता के सहारे बेचे जाते हैं। हालांकि, अश्लील और भड़काऊ कहे जानेवाले विज्ञापनों के खिलाफ शिकायत करने के लिए प्राधिकरण बने हैं, लेकिन व्यवहारिक तौर शिकायत करने वालों की संख्या नगण्य हैं। 
बड़े
 बड़े बैनर , होर्डिंग्स पर दिखता अंग प्रदर्शन महानगर मंुबई में अक्सर बड़े  बड़े बैनर या होर्डिंग्स पर महिलाओं के अंडरगार्मेंट्स के विज्ञापन छाए होते हैं।अंडरगार्मेंट्स के विज्ञापन दिखाना गलत नहीं है , लेकिन जिस तरीके से यह प्रदर्शित किया जाता है वहआपत्तिजनक है। इसी तरह फिल्मों के पोस्टर को भी ' सेक्सी ' और उकसाने वाला बनाया जाता है। फिल्मनिर्माता इसी के सहारे अपनी पब्लिसिटी करते हैं। आए दिन कई मामलों में राजनीतिक पार्टियां इनके खिलाफविरोध प्रदर्शन करती रहती हैं। कई बार ये प्रदर्शन इतने उग्र हो जाते हैं कि संबंधित फिल्म या विज्ञापन कंपनी केपोस्टर जलाए जाते हैं और फिल्म नहीं चलने की धमकी दी जाती है। हालांकि , यह सब ऊपरी तौर पर होता हैइस पूरे मसले को कभी गंभीरता से नहीं लिया जाता और न ही संबंधित प्रशासन कोई ठोस कदम उठाता है। कुछमहीने पहले ही मैनीक्वीन ( महिलाओं के अंडरगार्मेंट्स पहने पुतले ) को लेकर खूब बहस हुई। बीजेपी की एकनगरसेविका ने दुकान के बाहर लगे मैनीक्वीन्स को हटाने की मांग की थी। नगरसेविका का तर्क था कि दुकान केबाहर लगे मैनीक्वीन से पुरुषों की मानसिकता विकृत होती है और रेप जैसी हरकत की संभावना बढ़ती है।हालांकि यह मांग बहस और चर्चा के साथ ही बिना किसी परिणाम के ही समाप्त हो गई। 
सेंसर
 बोर्ड का काम फिल्मों में दिखाई जा रही हिंसा , अंग प्रदर्शन , गाली  गलौज आदि को अलग करना होताहै। बोर्ड की जिम्मा यह है कि सिर्फ उन्हीं चीजों को दिखाया जाए , जो भारतीय दर्शकों के अनुरूप हों। हालांकि ,सेंसर बोर्ड पर पिछले कुछ सालों से प्रभावशाली निर्माता , निर्देशक , अभिनेता आदि की फिल्मों पर पक्षपातपूर्णरवैया अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। ताजा उदाहरण अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम पर बनी फिल्म ' डी डे ' काहै। फिल्म को सेक्स और हिंसा के सीन के चलते सेंसर बोर्ड ने पहले दो बार ' ए ' सर्टिफिकेट दिया था , लेकिनबाद में इसे ' यू / ए ' सर्टिफिकेट दे दिया गया। 
मैं
 मानता हूं कि महिलाओं को फिल्मों या ऐड में ऑब्जेक्ट की तरह इस्तेमाल नहीं होना चाहिए , लेकिन फिल्मेंया ऐड रेप जैसे अपराधों के लिए पूरी तरह जिम्मेदार नहीं हैं। यह अपराध पुरुषवादी सोच का परिणाम है। दूसरे, देश की 50 फीसदी आबादी ऐसी है , जहां आज भी बराबरी का अधिकार महिलाओं को नहीं मिला है। क्याआज भी बहुओं - बेटियों को दुत्कारते नहीं हैं। खाने , पहनने , पढ़ने और जॉब तक में उनसे बराबरी का व्यवहारनहीं किया जाता है। सबसे पहले तो सोच बदलने की जरूरत है। 
यूरोप
 और अमेरिका में भी ऐड और फिल्में बनती हैं। वहां तो हमारे यहां से भी ज्यादा खुलापन है। फिर वहां क्योंबसों कारों में रेप नहीं होते ? वहां क्यों सड़क चलते छेड़खानी नहीं होती ? यह सब सोच का फर्क है।वहांमहिलाओं  पुरुषों में समानता है। हम अपनी महान संस्कृति और सभ्यता की दुहाई देते हैं , पर कहां गई हमारीसंस्कृति ? पहले हमें खुद अपने गिरेबान में झांककर देखना होगा कि हम महिलाओं के साथ अपने - अपने घरों मेंकैसा व्यवहार कर रहे हैं। 
फिल्मों
 और ऐड का सवाल है , तो रिमोट आपके हाथ में होता है। बदल दीजिए चैनल। कोई जबरदस्ती तो हैनहीं। दरअसल , जो पढ़े  लिखे और महत्वाकांक्षी लोग हैं , उन्हें न तो ऐड देखने की फुर्सत है , न टीवी देखनेकी। जिनका आधार ही बिगड़ा हुआ है , वहीं ऐसे अपराध होते हैं। जिन्होंने पढ़ा - लिखा नहीं है। जिनके कुछसपने नहीं है। जो नौकरी तक नहीं करना चाहते। वे ही गु्रप बनाकर , दारू की बोतल लेकर बैठते हैं औरअपराधों को अंजाम देते हैं। शिक्षा बहुत जरूरी है। 
वैसे
 , हमारे समाज को दोहरा रवैया भी है। पावरफुल लोग अपने पावर का गलत इस्तेमाल भी करते हैं। एकतरफ मुंबई  दिल्ली के रेप केस पर विरोध होता है , तो दूसरी तरफ आसाराम बापू को बचाने कुछ लोग समर्थनमें आ जाते हैं। भई , कम से कम जांच तो होने दो। इंसानियत के लिए यह सब बहुत घातक है। 

यह
 बात सच है कि महिलाओं का फिल्मों और ऐड में व्यापारिक इस्तेमाल होता है। इसका समाज पर भी असरपड़ता है , लेकिन यह पूरा सच भी नहीं है। पूरी तरह से दोष नहीं दिया जा सकता। देखिए , सीता को जब रावणने उठाया था या द्रोपदी का चीरहरण हुआ था , उस वक्त तो ऐड नहीं बनते थे। यह अपराध पुरुष मानसिकता कानतीजा है। सबसे पहले तो यह सोचना और समझना होगा कि महिलाओं भी इनसान हैं और उन्हें बराबरी का हकतथा इज्जत दें। अपने बच्चों को सिखाएं कि उन्हें कैसे महिलाओं की इज्जत करनी है। 
फिर
 फिल्म और ऐड बनाने वालों में सबका अपना  अपना नजरिया होता है। हम फिल्ममेकर को अपनासामाजिक दायित्व समझना चाहिए। दूसरी तरफ सेंसरशिप और साइट्स को बैन करने की मांग उठती है। इससेकोई फर्क नहीं पड़ेगा , क्योंकि यह विकृति अंदर से आती है। ज्यादातर तो ऐसे अपराधी हैं , जिनकी पहुंच सेइंटरनेट दूर होता है। 
महिलाओं
 को अपनी सोच बदलनी होगी। किसी बलात्कार पीडि़ता को समाज जीना मुश्किल करने वाली औरतेंही होती हैं। पीडि़ता पर उंगली उठाने और ताने देने वाली औरतें ज्यादा होती हैं। कोई उसे कलंकित कहता है , तोकोई चरित्र पर शक करने लगता है। इसके अलावा महिलाओं को यौन अपराधों के खिलाफ पुलिस के पास भीजाना चाहिए। कई महिलाएं तो पुलिस के पास जाती भी नहीं हैं , सिर्फ शर्मिंदगी के डर से।