Friday, November 13, 2015

सीमाताई को मंत्री बनाए जाने की उम्मीद

राज्यसभा सांसद व आरपीआई अध्यक्ष रामदास आठवले की पत्नी सीमाताई आठवले को महाराष्ट्र सरकार में मंत्री पद दिया जाना लगभग तय हो गया है। विधानमंडल के शीतकालीन सत्र से पहले होने वाले राज्य मंत्रिमंडल के विस्तार में सीमाताई को मंत्री बनाए जाने की उम्मीद है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार आरपीआई कोटे के मंत्री पद को लेकर आठवले और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बीच चर्चा हो चुकी है। जापान दौरे के समय ही दोनों के बीच सीमाताई को मंत्री पद दिए जाने को लेकर सहमति बन चुकी हैं।

हालांकि आठवले ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को विश्वास में लेने के लिए अभी तक कोई बैठक नहीं बुलाई है, पर माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल विस्तार की तारीख निश्चित होने के बाद ही आठवले पार्टी के आला नेताओं के साथ बैठक करेंगे।

Thursday, November 12, 2015

हिंदुत्व की खातिर

मुखपत्र 'सामना' में भाजपा की खुली आलोचना करने के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा है कि बिहार में अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी महाराष्ट्र के अलावा दूसरे राज्यों में भी चुनाव लड़ सकती है।
उन्होंने कहा कि हिंदुत्व के विचार की खाई भरने के लिए पार्टी ऐसा कर सकती है। शिवसेना राजग का हिस्सा है और उसने बिहार चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ा था। कल्याण-डोंबिवली नगर निगम के मेयर पद पर पार्टी के राजेन्द्र देवलेकर के चुने जाने के बाद कल्याण में पत्रकारों से चर्चा में ठाकरे ने यह बात कही।

उन्होंने कहा कि पहले पार्टी अन्य राज्यों में चुनाव मैदान में उतरने के पक्ष में नहीं थी, लेकिन वह हिंदुत्व की खातिर ऐसा करने को तैयार है।

Tuesday, November 10, 2015

शुभकामनायें

साथियों ,

आप सभी को तथा सभी के परिवार को  मेरी और मेरी पत्नी की ओर से दीपावली की  हार्दिक
शुभकामनायें

Monday, November 9, 2015

सरोगेसी पर लगे प्रतिबंध पर रोक

बांबे हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश में विदेशी दंपतियों के लिए सरोगेसी पर लगे प्रतिबंध पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने प्रतिबंध पर रोक उन दंपतियों के लिए लगाई है, जिनकी सरोगेसी की प्रक्रिया पूरी होने वाली है या जो इलाज के नाजुक दौर में हैं।
अंतरिम आदेश तीन तारीख को जस्टिस रवि देशपांडे की पीठ ने डॉ. कौशल कदम और कुछ प्रजनन केंद्रों की याचिका पर दिया गया था। याचिका में 27 अक्टूबर को इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च द्वारा जारी एक सूचना पत्र को चुनौती दी गई थी।
पत्र में बताया गया था कि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आदेश पर सरोगेसी केवल भारतीय विवाहित दंपतियों के लिए संभव होगी जबकि विदेशी दंपतियों के लिए इसे प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसमें डॉक्टरों से अनुरोध किया गया था कि वे विदेशी दंपतियों के लिए सरोगेसी की प्रक्रिया में सहयोग न करें।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में केवल उन विदेशी दंपतियों को राहत दी है जिनकी सरोगेसी की प्रक्रिया 15 से 20 दिन में पूरी होने वाली है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे ऐसे दंपतियों के नाम संबंधित अधिकारियों को बंद लिफाफे में रखकर दें। उसने यह भी कहा कि इन लिफाफों को कोर्ट की अनुमति के बगैर नहीं खोला जाए।
कोर्ट के मुताबिक, भविष्यमें ऐसे विदेशी दंपतियों को सरोगेसी का लाभ नहीं दी जानी चाहिए, जिनकी प्रकिया अभी शुरू नहीं हुई है। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रतिबंध के बारे में फैसला लिए जाने से पहले इससे प्रभावित होने वाले लोगों को नोटिस दी जाती है, जो इस मामले में नहीं किया गया।

सरोगेसी एक ऐसी तकनीक है जिसके जरिए वे दंपति बच्चा प्राप्त कर सकते हैं, जिनमें महिला किन्हीं कारणों से गर्भ धारण नहीं कर सकती। इस स्थिति में समझौते के तहत किसी जरूरतमंद महिला के गर्भ में पुरुष के शुक्राणु स्थापित कर दिए जाते हैं। महिला के गर्भ धारण करने के बाद भ्रूण उसके गर्भाशय में विकसित होता रहता है। बाद में निर्धारित समय पर महिला बच्चे को जन्म देती है, जिसे समझौता करने वाले दंपती को सौंप दिया जाता है।

Friday, November 6, 2015

एक बच्ची की रहस्यमयी मौत

दांतों के इलाज के दौरान पांच महीने पहले हुई एक बच्ची की रहस्यमयी मौत के मामले में डेंटिस्ट को क्लीन चिट मिल गई है। इस मामले की जांच के लिए गठित ससून जनरल हॉस्पिटल डॉक्टर्स के एक पैनल ने पाया है कि इलाज के दौरान डेंटिस्ट ने कोई लापरवाही नहीं की थी।
पैनल ने इस केस को 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' तो माना, लेकिन साथ ही इस केस में डेंटिस्ट की तरफ से कोई लापरवाही नहीं बरतने की बात भी कही। हालां‍कि, यह बात मृतक बच्‍ची के पिता निरंजन रेवतकर और पुलिस के गले आसानी से नहीं उतर रही है।
इस मामले में पुलिस ससून जनरल हॉस्पिटल को केस की फिर से जांच करने के लिए नोटिस जारी करने जा रही है। पुलिस यह जानना चाहती है कि डेंटिस्ट ने इलाज से पहले मरीज पर ऐलर्जी टेस्ट करके देखा था या नहीं? पेशे से आईटी प्रोफेशनल निरंजन ने कहा है कि वह न्‍याय पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे।
यह है मामला
पुणे के ससून जनरल हॉस्पिटल में 29 जून को करीब साढ़े तीन साल की सानवी रेवतकर की रूट कनैल सर्जरी की गई थी। इस दौरान अचानक बच्ची की तबीयत खराब हो गई और उसे एक निजी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। वहां भी डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया, तो बच्ची के माता-पिता उसे पास के एक अन्य निजी अस्‍पताल ले गए, जहां डॉक्टर्स ने उसे मृत घोषित कर दिया गया।

इस हादसे के बाद बच्ची के पिता ने डॉक्टर डेंटिस्‍ट के खिलाफ केस दर्ज करा दिया था। पुलिस ने मेडिकल रिपोर्ट मामले की जांच कर रहे डॉक्टर्स के आंतरिक पैनल को दे दी। अब पांच महीने बाद पैनल ने डेंटिस्‍ट को क्‍लीन चिट देते हुए कहा कि मौजूद दस्तावेजों की जांच करने के बाद यह कहीं से नहीं पता चलता है कि डेंटिस्ट ने कोई लापरवाही की थी।

Wednesday, November 4, 2015

35,000 रुपए का हर्जाना

अपने कर्मचारी की लापरवाही की यहां के यूनियन बैंक को कीमत चुकाना पड़ी। बैंक ने खाते में फंड होने के बावजूद अपने एक ग्राहक का चेक लौटा दिया था। ग्राहक ने उपभोक्ता फोरम में शिकायत की, जहां ग्राहक को 35,000 रुपए का हर्जाना भरने का आदेश दिया गया।
लालबाग निवासी लालचंद जैन ने 26 मार्च 2014 को अपने एक लेनदार को 72,000 रुपए का चेक दिया था। 29 मार्च को बैंक ने यह कहते हुए चेक लौटा दिया कि खाते में पर्याप्त राशि नहीं है। जैन का कहना है कि उनके बचत खाते में चेक क्लियर होने जितनी राशि थी, फिर भी चेक बाउंस कर दिया गया और 150 रुपए वसूल लिए गए।
बकौल जैन, चेक बाउंस होने के बाद जिस शख्स को राशि देना थी, उसने मुझे परेशान किया, गालियां भी दीं। इस पर जैन ने बैंक को चिट्ठी लिखी और सफाई मांगी। 20 जून को लिखी गई चिट्ठी का 8 अगस्त को जवाब आया, जिसमें हास्यास्पद कारण बताए गए।

अपनी मानसिक परेशानी से एवज में उन्होंने मुआवजे की मांग करते हुए उपभोक्ता आयोग में शिकायत की। जिस पर अब यह फैसला आया।

कंपनी का तर्क मान्‍य नहीं

बॉम्‍बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि यदि पति अच्‍छा कमाता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि परिवार पत्‍नी के वेतन पर निर्भर नहीं करता है। जस्टिस अभय ओका और रेवती डेरे की डिवीजन बेंच ने न्‍यू इंडिया इंश्‍योरेंस कंपनी को आदेश दिया है कि वह सांगली के रहने वाले सुनील गरुण और उनके दो बेटों को सात फीसद ब्‍याज के साथ 47 लाख रुपए हर्जाना दे।
इंश्‍योरेंस कंपनी ने यह कहते हुए इस दावे का विरोध किया था कि सुनील सरकारी कर्मचारी है और अपनी पत्‍नी से अधिक कमाते हैं। कंपनी का दावा था कि सुनील की पत्‍नी उज्‍जवला गरुण इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर थी और इसलिए वह पत्‍नी के वेतन पर निर्भर नहीं थे।
हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि कंपनी का यह तर्क मान्‍य नहीं है। कॉस्‍ट ऑफ लिविंग को ध्‍यान में रखते हुए आज के दौर में पति और पत्‍नी, दोनों की आय घर को चलाने के लिए महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि दोनों की आय एक दूसरे की पूरक है। न्‍यायाधीश ने कहा कि जब पति-पत्‍नी दोनों कमाते हैं तो वे खर्चों को साझा करते हैं, जिससे अधिक बचत होती है।

इस मामले में मृतक महिला उज्‍जवला अपनी पूरी सैलरी घरेलू खर्चों को पूरा करने और दो बेटों की शिक्षा पर खर्च कर रही थी। इस प्रमाण को चुनौती नहीं दी जा सकती है। गौरतलब है कि तीन जनवरी 2009 को मुंबई से बैठक के बाद लौटते वक्त सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई थी।